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We do not want such a new India

नहीं चाहिए ऐसा नया भारत 


भारत हमेशा  से ही अपनी एकता अखंडता और संप्रभुता के लिए प्रसिद्ध रहा है। न जाने कितने क्रांतिकारियों ने  आज़ाद  भारत के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी और उनका आजाद भारत का   सपना आज भी अधूरा मालूम पड़ता है।  कहने को तो हमने आजादी प्राप्त कर ली लेकिन अभी भी भारत भ्रष्टाचारियों की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। आज भी कुछ ऐसे नाकारा निकम्मे अफसर, मंत्री या अन्य लोग हैं जो भारत को दीमक की तरह भारत को खोखला कर रहे हैं। जहाँ एक ओर भारत आगे बढ़ रहा है वही दूसरी ओर आज भी ऐसी कई समस्याएं हैं जिनका हल  नहीं  निकल पाया है। हमे नहीं चाहिए ऐसा नया भारत जहाँ -

खुलेआम गुंडागर्दी हो और कोई न्याय करने वाला न हो 
बंगाल में काफी समय से गुंडागर्दी चल रही है हर रोज हत्याएँ हो रही है। बंगाल के लिए यह कोई नयी बात नहीं यहाँ सालों से ही ऐसा  हो रहा है। कुछ गुंडे सरे - आम हफ्ता वसूलते है और बेवजह का अतिरिक्त टैक्स लगाया जाता है। निर्दोषों को सजा मिलती है और जो अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है उसकी आवाज  दबाने की कोशिश की जाती है और यदि न माने तो हत्या कर दी जाती है। ये देश सबका है और यहाँ प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा का अधिकार होना चाहिए फिर चाहे वो किसी  भी धर्म या किसी भी जाति का लेकिन बंगाल में डॉक्टर्स सुरक्षित नहीं है मरीज़ के परिवारजन की  गुंडागर्दी की वजह  से। सभी  को सुरक्षित रहने का अधिकार है लेकिन इस हड़ताल  के लिए डॉक्टर अपनी वो शपथ भूल  गए जो उन्होंने डॉक्टर बनने से पहले ली थी। हड़ताल करने और अपनी मांग पूरी करवाने के दूसरे रास्ते भी  हो सकते थे।  कुछ डॉक्टर्स ने तो अपना फ़र्ज़ निभाया लेकिन ज्यादातर अपना फ़र्ज़ निभाने से चूक गए। शर्म आती  है ममता दीदी पर मुख्यमंत्री होकर भी इतनी मक्कारी कैसे कर लेती है।

 जब रक्षक ही भक्षक बन जाये 

  

मध्य प्रदेश के भोपाल के बैरागढ़ थाने में पुलिसकर्मियों ने कथित तौर  पर  शिवम मिश्रा की पीट-पीटकर हत्या कर दी। पुलिस पर मृतक की करीब 15 तोले सोने की चेन और अंगूठी लूटने के भी आरोप लगे हैं। देर रात शिवम और उसका दोस्त गोविंद गाड़ी से जा रहे थे।  रास्ते में उनकी कार बीआरटीएस कॉरिडोर की रेलिंग से टकराई थी। जिसके बाद पुलिस दोनों को अस्पताल ले जाने की बजाय थाने ले गई। आरोप हैं कि पुलिसकर्मियों ने थाने में दोनों की बुरी तरह से पिटाई की।  जिससे शिवम की मौत हो गई, जबकि गोविंद को भी पीट-पीटकर अधमरा  कर दिया। फिलहाल गोविंद का अस्पताल में इलाज चल रहा है। पुलिसकर्मी थाने  सी. सी. टी. वी. फुटेज  नहीं  दिखा रहे हैं। शिवम् मिश्रा के माता पिता दोनों दिव्यांगजन है।  वे अपने माता पिता की एकलौती संतान थे। आखिर  उन्होंने ने कौन सा गुनाह कर दिया था जो पुलिसवालों ने उन्हें पीट पीट कर मार डाला।  अगर उनका कोई कसूर होता  भी तो अदालत उन्हें सजा देती। आखिर क्यों पुलिसवालों ने जज का काम करना  शुरू कर  दिया ?  जब पुलिस वाले ही ऐसा करने लगेंगे  तो अपराधियों को  सजा कौन देगा ? यह कोई नयी बात नहीं है  न जाने कब  से ऐसा ही होता आ रहा है न जाने कितने ही बेकसूर और निर्दोष लोगों  को हर रोज मार दिया जाता है।  हमें  सिर्फ वही ख़बरें देखने को मिलती है जिन तक मीडिया पहुंच पाता है। इसी गुंडागर्दी के चलते हर रोज कई बेकसूरों की हत्या हो जाती है और किसी को कानों - कान खबर तक नहीं होती।  
     

  जहाँ का सिस्टम बहरा हो चुका हो और सब अपनी मनमानी  करें 

आज का सिस्टम  बहरा हो चुका है।  मौतें  100 हो या  1000 ज्यादातर लोगों  के लिए  ये सिर्फ एक संख्या है।  किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता की आम जनता किन तकलीफों से झूझ रही है। ज्यादातर अफसर बेईमान है और लापरवाह है उन्हें बस खुद की जेब  भरने से मतलब है। कहने को तो मंत्री, सांसद औरअन्य अफसर आम जनता की सेवा के लिए होते है लेकिन असल जिंदगी में ये क्या करते है यह सच्चाई किसी से छुपी नहीं  है। मुजफ्फरपुर में रोज बच्चें अपनी जान गवाँ रहे हैं किसी को क्या फर्क पड़ता है। सरकार तो  बस हाथ पर हाथ रखकर बारिश का इंतजार करेगी। और अपनी नाकामियों का थोड़ा सा दोष लीची को देना तो बनता ही है न । सरकार अगर सही व्यवस्था न कर पाए तो इसमें सरकार की गलती नहीं है  बल्कि सारा का सारा दोष तो लीची और बारिश का ही है न। नितीश कुमार को मुजफ्फर पुर जाने की न क्या  जरुरत पड़ गयी अचानक लगभग २० दिनों के बाद बच्चों की याद कैसे आ गयी।  बच्चे मरते हैं तो  मरने दो उनके लिए तो ये सिर्फ एक संख्या है।  और आखिर बारिश होगी भी तो कैसे हम तो सिर्फ पर्यावरण दिवस के दिन ही पेड़ लगते है और वो भी 1 पेड़ लगाकर 15 लोग सेल्फी लेते है बस हो गया काम। फिर उसके बाद शायद ही किसी को सुध रहती हो की और पेड़ लगाने चाहिए जिस से ग्लोबल वार्मिंग काम हो।   






विशेष अनुरोध 
अभी इस कड़ी में बहुत कुछ जुड़ना बाकि है तो कृपया जुड़े रहिये।  

Comments

  1. सच है यह सपना तो आज़ादी के पहले क्रांतिकारियों ने देखा ही नहीं था । आज बैंक जाते समय बगल की सीट में एक स्टूडेंट मिली वह एमबीबीएस के आखिरी साल में है और तिर्वा के मेडिकल कालेज में है । बातचीत के दौरान वह काफी घबराई हुई थी इस प्रोफेशन के बारे में ।

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  2. अभी गत दिनों डॉक्टर्स पर हमले को लेकर

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