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The reason behind farmer's suicide in India

 भारत के किसान आत्महत्या करने को क्यों मजबूर है ?

भारत एक कृषि प्रधान देश है यह तो हम सब जानते हैं। एक महाशक्ति बनने की और अग्रसर भारत की सबसे बड़ी सकती  कृषि। 2011 के  आकड़ो के अनुसार भारत में लगभग 61.5% आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप  से कृषि पर निर्भर है।  लेकिन इसे हमारा दुर्भाग्य ही कहा जायेगा की जिस देश में कभी "जय जवान जय किसान " के नारे लगे हो उसी देश में आज हर 3० मिनट में एक भारतीय किसान आत्महत्या कर रहा है और जितना अनाज पैदा होता है उसका आधे से ज्यादा ही बर्बाद होता है। आप खुद ही सोचिये यदि किसान इसी तरह आत्महत्या करते रहेंगे तो इस देश का भविष्य क्या होगा ? बिना अन्न के आप कैसे जियेंगे ? किसानों  का हमारे जीवन में बहुत बड़ा योगदान है।  परन्तु  भारत में किसानों  की स्थिति बिगड़ती जा रही है।



भारत में किसानों की आत्महत्या के कारणों में विद्वानों ने मानसून की विफलता, जलवायु परिवर्तन, उच्च ऋण बोझ, सरकारी नीतियों, मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तिगत मुद्दों और पारिवारिक समस्याओं जैसे कई कारण बताए हैं। आइए विश्लेषण करते हैं:-

इनपुट लागत में वृद्धि: भारत में किसानों की आत्महत्याओं का एक प्रमुख कारण कृषि आदानों की बढ़ी कीमतों के कारण किसानों पर बढ़ता बोझ है। इन कारकों की परिणति खेती की लागत में समग्र वृद्धि के रूप में देखी जाती है, गेहूं के लिए, वर्तमान में लागत 2005 की तुलना में तीन गुना अधिक है।

रसायनों और बीजों की लागत: यह उर्वरक, फसल सुरक्षा रसायन या यहाँ तक कि खेती के लिए बीज हों, खेती पहले से ही ऋणी किसानों के लिए महंगी हो गई है।

                

ऋण के कारण परेशान:कई किसानो को अपनी व्यक्तिगत परेशानीओं अथवा उर्वरकों , बीज आदि के लिए  ऋण लेना पड़ता है और समय पर ऋण न चूका पाने की वजह से से देनदार इन्हें बहुत परेशान करते हैं। कई बार तो देनदार किसानों के अशिक्षित होने की वजह से इन्हे बेवकूफ बना कर ज्यादा ब्याज वसूलते हैं।

बाजार के साथ प्रत्यक्ष एकीकरण का अभाव: हालांकि राष्ट्रीय कृषि बाजार और अनुबंध कृषि जैसी पहल किसानों की उपज को सीधे बाजार के साथ एकीकृत करने में मदद कर रही हैं, मध्यस्थों की भूमिका में कटौती कर रही है, वास्तविकता अभी भी अलग है।

जागरूकता की कमी: डिजिटल विभाजन, साथ ही साक्षरता अंतराल ने, सीमांत और छोटे किसानों को विशेष रूप से कमजोर बना दिया है, जो सरकारी नीतियों की सकारात्मकता का उपयोग करने में असमर्थता के कारण कमजोर हो गए हैं। यह निरंतर जारी रहने वाली फसल प्रथाओं में परिलक्षित होता है - जैसे पानी की कमी वाले क्षेत्रों में गन्ने की खेती।


जल संकट: महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे राज्यों के पानी की कमी वाले क्षेत्रों में इन आत्महत्याओं की सघनता इस बात का प्रकटीकरण है कि कैसे जल संकट और जिससे उत्पादन मांगों को पूरा करने में विफलता ने खतरे को तेज किया है। यह निरंतर विफल मॉनसून की पृष्ठभूमि में विशेष रूप से सच है।




किसानो की मदद कैसे करें :-

  • खाने की अहमियत को समझें थाली में उतना ही खाना ले जितना आप खा सकें।
  • जरुरत के हिसाब से ही पानी खर्च करें , पानी बर्बाद होने से बचाये।
  • यदि आप के आस पास किसान रहते हैं तो उन्हें नयी तकनीकों अथवा सरकार की कृषि योजना के बारे में बताये।
  • यदि आप इकट्ठा अनाज (गेहूँ , चावल) खरीदते हैं तो हो सके तो किसानो से प्रत्यक्ष रूप से खरीदें।
  • किसानों को वर्षाजल संरक्षण ( Rain water harvesting ) के बारे में बताये।
  • मिट्ठी को और उपजाऊ कैसे बना सकते हैं इसकी जानकारी दें।
  • सब्जीवालो से सौदेबाज़ी न करें मतलब की 10 , 5 रुपये के चक्कर में झिक -झिक न करें।
  • किसी मंदिर में दान देने की बजाय किसानो की सहायता करें।
  • हो सके तो किसानों को एवं उनको बच्चों निशुल्क शिक्षा प्रदान करें।

कभी आप खुले आसमान के नीचे अपनी कमाई रख कर देखिये , रात भर नीद नहीं आएगी .......
तो जरा सोचिये उस किसान पर क्या गुजरती होगी ?

किसानो को कुछ पता नहीं होता की कल का मौसम कैसा होगा या उनकी फसल कैसी होगी हम उनके दर्द और दुखों का अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं,यहाँ तक की कई किसानों का तो रोम- रोम क़र्ज़ में डूबा होता है😔अगर किसान इतने तकलीफें सह कर अन्न उगाते है तो हमे भी कोई हक़ नहीं है की हम भोजन बर्बाद करे। तो आप भी कोशिश करिये की भोजन बर्बाद न हो और दुसरों को भी प्रेरित करें।


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