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The biggest disease - What people will say ?

सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग ?

हम अपने जीवन में खुद से ज्यादा दूसरों के बारे में सोचते है। हमारे ज्यादातर फैसले इस बात पर निर्भर करते है की लोग क्या कहेंगे ? यदि हम दूसरों  के बारे  खुद के बारे में  सोचे तो ज्यादा खुश रह  सकेंगे। कई बार हम अपने सपने या शौक यही सोच कर छोड़ देते है की लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे ?



हमारे जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम कोई काम शुरू करने से पहले ही इस असमंजस या दुविधा में पड़ जाते हैं कि हमारे काम की दशा, दिशा, मार्ग, सफलता या असफलता पर लोगों की प्रतिक्रिया क्या होगी।ऐसे में तयशुदा लक्ष्य व उसकी प्राप्ति के मार्ग से भटक जाना हमारी नियति बन जाती है।  ईश्वर ने हमें  एक पूरी स्वतंत्र इकाई के रूप में धरती पर भेजा है – सम्पूर्ण कौशल, व्यक्तित्त्व , शरीर व बुद्धि के साथ  इसलिए हमें  लक्ष्य व मार्ग दोनों स्वयं ही तय करने हैं अपने विवेक से न की दुसरों के कहने से।

बहरे मेढंक की कहानी

मेढकों का एक झुंड जंगल घूमने निकला। सैर करते-करते दो मेढक एक गहरे गड्ढ़े में गिर गए।  बाहर खड़े उनके दोस्तों ने गड्ढ़े में झांका।  उन्हें लगा कि कितनी भी कोशिश क्यों न की जाए, उनका बाहर निकल पाना नामुमकिन है।  वे गड्ढ़े में फंसे मेढकों से कहने लगे कि हाथ-पैर मारने का कोई फायदा नहीं, वे किसी भी कीमत पर नहीं बच पाएंगे। वह गड्ढा उनके लिए मौत का गड्ढा साबित होगा। 

दोनों मेढकों ने उन्हें अनसुना कर दिया और बाहर निकलने की भरसक कोशिश करते रहे।  बाहर से झांकते मेंढक उनके न बच पाने की बात दोहराए जा रहे थे। आखिरकार एक मेंढक निराश हो गया. उसने बाहर निकल पाने की आस छोड़ दी और वहीं मर गया।  दूसरा मेढक अब भी बाहर निकलने की कोशिश में बराबर जूझता रहा। कुछ देर बाद वह गड्ढ़े के बाहर था।  बाहर निकलते ही उसने अपने मित्रों को धन्यवाद दिया। मेंढक कुछ समझ नहीं पाए। यह बाहर कैसे निकल गया।  उसने उन्हें बताया कि वह बहरा है और जब वह बाहर आने के लिए लड़ रहा था, तब उन्हें सुन तो नहीं पा रहा था, लेकिन यह भलीभांति समझ रहा था कि वे सब उसे बाहर आने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे।  

मेंढक ऐसे लोगों की बातों में नहीं आया। बल्कि उल्टा उसने तो यह समझा कि वे उसका उत्साह बढ़ा रहे हैं।  वह अपने सोच के साथ बगैर लोगों के कथन की परवाह किए बढ़ता चला गया जब तक कि अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लिया। उस मेढंक ने तो अपनी जान बचा ली बस अब आपको  करना है।  आपको भी बहरा  होना है पर सिर्फ उनके लिए  आपको हतोत्साहित (demotivate) करते है।


जब तक आप अपने आपमें स्पष्ट तथा सुलझे हुए हैं। आपको निश्चित होकर आगे कदम बढ़ाना चाहिए।  आखिरकार सफर तो आपको ही तय करना है।  कोई अन्य तो आपका भर उठाने से रहा। ऐसे में क्यों समय बर्बाद किया जाए तथा औरों की सुनकर निरुत्साहित हुआ जाए।  मन हमारा है तो मनोबल भी हमारा ही होना चाहिए। आप अपने मार्ग पर हाथी की मदमाती चाल से चलते रहिए।  मंजिल खुद आपके लिए पलक पांवड़े बिछा आपसे मिलने को आतुर रहेगी। 

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