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Suicide is not a solution to failure

आत्महत्या नहीं है असफलता का हल  हम सभी अपने जीवन  में सफल होना चाहते है, पर हम में से कुछ लोग असफल हो जाते है। लाख कोशिशों करने के बावजूद कुछ लोगों को असफलता का सामना करना पड़ता है। जीवन में असफल तो हम सब होते परन्तु इसका अर्थ यह नहीं की  हम हार मान ले और अवसाद (डिप्रेशन) में चले जाये। अवसाद एक धीमे ज़हर की तरह होता है जो धीरे-धीरे अंदर से आपके शरीर को खोखला करता जाता है । भारत में लगभग हर साल  13,50,00 लोग आत्महत्या करते है जो पूरी दुनिया में होने वाली आत्महत्याओं का 17% है।  अकसर इन आत्महत्याओं का कारण करियर में असफलता , धोखा  आदि होता है।  तो यदि आप भी अवसाद से ग्रस्त है या आपके मन में भी आत्महत्या के ख्याल आते है तो ये लेख आपके लिए है। आपका जीवन अमूल्य है कई बार में हमारे जीवन में ऐसे मोड़ आते है जब हमे सही रास्ता नजर नहीं आता।  हमे  लगता है की किसी को हमारी परवाह नहीं है और हम अकेले है। हम यह सोचते है की हमारा इस दुनिया में कोई नहीं है या किसी को हमारी जरुरत नही है।  पर यकीन मानिये की ऐसे बहुत से लोग ज...

Childhood is recalling

बचपन बुला रहा है  पलटे जब जीवन के पन्ने  लगा की मानो बचपन बुला रहा है।  पापा की ऊँगली पकड़ के चलना , वो उड़ती तितलियाँ को पकड़ना , पापा का दौड़  कर साइकिल सीखाना ये सब याद आ रहा  है। खोला जब स्कूल की यादों के पन्ने तो लगा बचपन के साथियों का  जत्था बुला रहा है।  वो भी क्या दिन थे  जब हम बालू के ढेर में घरोंदे बनाया करते थे , कहीं  भी सोते पर आँख खुलने पर खुद को बिस्तर पर ही पाते , जब चाँद का पीछा करते और सोचते की चाँद हमारे साथ-साथ क्यों चल रहा है , फलों के बीज खा कर सोचते की हमारे पेट में ही न पेड़ उग जाये।  बचपन के वो पल फिर याद आ रहे है जब न रोने की वजह थी न हंसने का बहाना था न सुबह के खबर थी न शाम का ठिकाना था , थक कर आना स्कूल से पर खेलने भी जाना था न कल की चिंता न भविष्य  के सपने । बहुत याद आता हैं  वो दिन जब माँ पीछे भागा करती थी लेकर  दूध का गिलास , वो माँ का  लोरियां गा  कर सुलाना  , वो जरा सी बात पर झगड़ना , वो शक्तिमान के लिए भाई से लड़ना और रिमोट का खींचत...

Social Media's Impact in our life

 हमारे जीवन पर सोशल मीडिया का प्रभाव आज कल की दुनिया में हम  सोशल मीडिया से एक पल में हज़ारो दोस्त बना सकते है पर इस बात की कोई गारंटी नहीं की वो दोस्त कितना सच्चा है? आज इंटरनेट  के युग में न जाने हम कितनी दूर चले आये है उन सभी पल से जो हम अपने दोस्तों, परिवार और रिश्तेदारों के संग बिताया करते थे |  आज की पीढ़ी में हम एक ही क्लिक से ऑनलाइन मित्र बना रहे हैं। हम नहीं जानते कि वे कितने वफादार हैं? आज के युग में हमारी सच्ची दोस्ती न जाने कहाँ खो गयी है , वो टपरी वाली चाय , वो शाम को मैदान का क्रिकेट, वो गिल्ली डंडा, वो पेड़ से आम चुरा के खाना , वो परिवार के संग घूमना मस्ती करना ये सब जाने कहाँ खो गया है। सोशल मीडिया पर वक़्त बिताना बुरा नहीं है पर जिंदगी को खुल के जीना भी जरुरी है अपने यार दोस्तों के संग अपने रिश्तेदारों के संग। नहीं तो हम कितने अकेले हो जायेंगे ये हम खुद नहीं जानते असली जीवन तो चार दीवारों के बाहर है बस जरुरत है तो उस जीवन को जीने की। तो इंतजार किस बात का है सोशल मीडिया से बाहर आइये और कुछ पल अपने दोस्तों , रिश्तेदारों और परिवा...